Tuesday, 10 May 2016

पहली साइकिल यात्रा - श्री आनंदपुर साहिब


जनवरी का महीना पूरे उत्तर भारत में शरद ऋतू का दूत कहलाता है।  ठण्ड इतनी ज्यादा होती है की घूमना फिरना तो दूर ,व्यक्ति  अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी घर से बाहर निकलना पसंद नहीं करता , लेकिन मेरी  मानो तो साइकिल चलाने  के लिए ,इससे अच्छा कोई और समय नहीं हो सकता।  यही सब सोचते हुए 15 जनवरी को साइकिल खरीद ली और 18 से कॉलेज भी खुल गए थे , अब तो तरुण भाई भी घर से वापस लौट चुके थे।  कुछ 4 - 5 दिन सुबह 10 -15 किलोमीटर  साथ में साइकिल चलाने के बाद विचार आया की, कहीं लम्बी यात्रा हो जाए तो हम लोगों  का साइकिल खरीदना सफल हो जाएगा और सौरभ जी, जो की एक दिन में  253 किलोमीटर साइकिल चला चुके थे , उनका साथ तो था ही।  तरुण जी के मन में पंजाब और चंडीगढ़ के आस पास के उन इलाको को घूमने की बड़ी लालसा दिखाई देती थी - जो सिख इतिहास के पन्नो के अहम पृष्ठ है। उन्ही में से एक स्थान है श्री आनंदपुर साहिब। 

श्री आनंदपुर साहिब - एक ऐसी पावन  धरा जिसकी  नींव दसवें गुरु श्री गुरुगोबिंद सिंह जी ने रखी थी,
यही वो पवित्र स्थान है जहाँ दशमेश पिता ने पंज प्यारों का बलिदान स्वीकार  कर खालसा पंथ की  स्थापना करी थी इसलिए इसे तख़्त श्री केशगढ़ साहिब नाम दिया गया। वैसे तो आनंदपुर साहिब की स्थापना 1665 में नौवें गुरु श्री तेग बहदुर जी द्वारा की गयी और उन्होंने अपनी माता के नाम पर इसका नाम दिया - "चक नानकी ", लेकिन बाद में दशमेश पिता श्री गुरुगोबिंद सिंह जी  ने  25 वर्ष आनंदपुर साहिब में बिताते हुए यहाँ आस पास अनन्य किलों का निर्माण किया जो सक्षम थे मुग़लों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए। इन्ही सब बातों को जानने के लिए आनंदपुर साहिब जाने का मन बनाया। 

22 जनवरी , शुक्रवार का दिन तय हुआ, सुबह कॉलेज में लेक्चर अटेंड किये और दोपहर 1 बजे हम हॉस्टल से चल दिए , करीब 5  किलोमीटर बाद पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचे और वहा  से सौरभ जी को साथ लेते हुए निकल पढ़े आनंदपुर सहिब के लिये।
3 दोस्त 3 साइकिल और एक मंज़िल - साईकल पर जीवन का  पहला ट्रिप था और मुझे ठीक से दूरी का भी नहीं पता था, बस चलते गये ,चलते गए। पहले चंडीगढ़ में और अब कुराली के लिए।  
चंडीगढ़ कुराली रोड था तो 4 लेन हाईवे,  लेकिन तेज़ी से चलती हुई गाड़िया , ट्रैक्टर ,बुग्गियां हमें सतर्कता से चलने का संदेश बार बार दे रही थी। 
करीब 1 घंटा साइकिल चलाने के बाद हम कुराली-चंडीगढ़ रोड पर ठीक उसी जगह रुके जहां से हमारा (मेरा और सौरभ का) पिछला कॉलेज कुछ ही किलोमीटर दूर था.

गुड कारखाना 
सौरभ जी कैमरे का और मैं गुड का लुफ्त लेते हुए 

रुकने का कारण था 'गरम गुड' 
इस रोड पर अनेकों गुड़ बनाने के कारखाने थे , एक पर हम रुके ,गुड़ खाया और फिर रोपड की तरफ़ चल दिए,
2:30 बजने पर जब गुड़  खा कर चले तो कुछ स्थानीय स्कूली बच्चों से रेस लगाई , कुछ दूर तक तो खूब तेज़ चलाई पर अंत में बच्चों ने हरा दिया , बच्चों में बहुत ताकत होती है और हम पिछले 25  किलोमीटर से साइकिल भी तो चला रहे थे, बातों बातों में कुराली पहुँच गए। 
30  किलोमीटर साइकिल चलाने के बाद थकान का एहसास होने लगा था, धूप तो थी ही लेकिन सर्दियों वाली। 
टी-शर्ट पसीने से लत पत , मुंह पे मिटटी की परत , पैरो में मीठा मीठा दर्द और कुछ साथ में  चलते लोग,
कोई साइकिल पर , कोई  स्कूटर, कोई बस , कोई गाडी तो कोई बैल गाडी में , सभी प्रकार के लोग मिलते और आगे निकल जाते। कोई देख कर हस देता, तो कोई हस कर देखता, लोगों के निरन्तर मिलते सकारातमक भावों से आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती रही  , लेकिन शरीर तो जवाब देने लगा था।

3:45बजे करीब 50 किलोमीटर साइकिल चलाने के बाद , एक जगह रुके और कीनो जूस पिया , ताज़गी का एहसास कुछ ही किलोमीटर तक साथ रहा, फिर सोचा की सौरभ की रेसिंग साइकिल से सफर पूरा कर लिया जाए।
मेरे पहले ही आग्रह पर सौरभ जी मना न कर पाये और मुझे अपनी साइकिल दे दी।
हीरो हॉक - जिसकी सख्त और ऊँची गद्दी थी , उस पर सवार हो कुछ 5 - 7 किलोमीटर का सफर और तय कर लिया, सौरभ जी की वो साइकिल थी तो झर झर हालत में लेकिन चलती बहुत तेज थी  है , उस गंजे टायर वाली  हीरो हॉक की टेस्टिंग का वो पहला सफर था ।
अब दिन ढलने को था , मैं अपनी साइकिल पर वापस आया और तरुण जी के साथ चलने लगा। दोनों का यह पहला साइकिल सफर था , दोनों एक दूसरे की ओर मुस्कुरा कर देखते और मन ही मन कहते - यार ये क्या पंगा लिया ? लेकिन एक दूसरे का हौंसला कम ना हो, इसलिए नकारात्मक भावो को मन में ही समेट लेते और जुबान पर आती वो हसी जो अंतरमन से वर्तलाप कर जाती।
तरुण भाई ने पूरे रास्ते मेरा ढाँढस बढ़ाने के लिए, जगह जगह बहुत से चित्र अपने फ़ोन में कैद किये।

 भकरा से आती हुई एक प्रमुख नहर 

एन.एच. 21  पर घनौली के पास 

डूबते सूरज को सलाम 
करीब 6 बजे के आस पास सूरज भी विदाई दे गया , लेकिन हम लोग अपनी साइकिल पर पर्याप्त रौशनी करने वाले उपकरण लगा कर चले थे।
चंडीगढ़ से आनंदपुर साहिब के बीच सैकड़ो फ्लाईओवरो ने टांग की नसों को जाम सा कर दिया था और पैरो में निरन्तर बढ़ता दर्द मुझे ये कहने पे मजबूर कर गया की, रात किरतपुर में ही बिताई जाये। मेरे फैसले को मंजूरी देते हुए  , दोनों साथिओ ने मुझे आगे बढ़ने को कहा।
मैं फिर तेजी से चल पड़ा, यह सोच कर की अब कीरतपुर तो 10 किलोमीटर ही शेष बचा है , 
लेकिन मेरे आगे चलने से पीछे रहे दो साथियो की रणनीति से मैं अवगत ना था। उन्होंने  कुछ  बात करी और सौरभ जी आगे निकल गए , पीछे पीछे मैं और तरुण जी रेस जैसी लगाते हुए कीरतपुर पहुँचे , जहाँ पर विचारों का मत भेद हुआ
और 3 में से 2 लोगो ने यह फैसला किया की रुकेंगे तो आनंदपुर।
अब मैं अकेला तो कीरतपुर  रुक नहीं सकता था, इसलिए भारी मन से यह फैसला लिया की सौरभ जी की साइकिल पर अब आनंदपुर जाकर ही रुकुंगा।
आगे बढ़ते हुए द्वारिका प्रसाद महेश्वरी जी वो पंक्तिया याद कर ली जो बचपन में नंबरों की दौड़ में भागने के लिए रटी थी 
                                                  वीर तुम बढे चलो ,    धीर तुम बढे चलो
                                                   प्रात हो कि रात हो,   संग हो न साथ हो,
                                                   सूर्य से बढ़े चलो,       चन्द्र से बढ़े चलो ,
                                                   वीर तुम बढ़े चलो      धीर तुम बढ़े चलो। 

और इसी तरह करीब 7:30 हम श्री  आनंदपुर साहिब पहुँच गए लेकिन अब मुझे मेरे साथियो के द्वारा लिए गए फैसले पर अफ़सोस ना था,क्योंकि अगले दिन 10 किलोमीटर दूर आनंदपुर का आना जाना 20 किलोमीटर में बदल जाता 
साइकिल स्टैंड  पर लगा कर , धर्मशाला में सामान रख कर , श्री गुरुद्वारा के दर्शन किये , भोजन किया और सो गए। नींद बहुत अच्छी आई। 


अगले दिन वपसी करने से पूर्व हम  विरासत-ए-खालसा के लिए रवाना हो गए। 'विरासत-ए-खालसा' नाम से ही  पता लगता है की कोई ऐसा स्थान होगा जहां खालसा पंथ की विरसता छिपी हो। श्री गुरुद्वारा साहिब से कुछ ही मील दूर एक अद्भुत स्थान जिसे एक बार घूम लेने से सिख गुरुओ द्वारा समाज के लिए किये गए बलिदानो का एहसास हो जाता है। देखने में इतना सुन्दर की पूरे पंजाब  में अजूबे के नाम से प्रसिद्ध है। 

म्यूजियम में एंट्री का रास्ता 

म्यूजियम की छत से तालाब का नजारा 

वापस की तयारी 

चलो चलें वापस 
वापसी के लिए तैयार तो थे हम लेकिन तरुण भाई के घुटने में दर्द हो रहा था।  गौर से देखा तो पता चला की उनके बांये पैर का घुटना सूज गया था , अब ऐसे में 90 किलोमीटर साइकिल पर वापसी करना उचित ना था इसलिए मैं और तरुण जी बस से चंडीगढ़ वापस आये और हमारी साइकिलें  बस की छत पर।
लेकिन गौर करने वाली बात ये है की हमे बस से  वापसी करने में जहाँ 2:45 लगे वहीं सौरभ जी ने 90 किलोमीटर की दूरी को 3 घण्टे 50 मिनट में तय कर ली।

पहली साइकिल यात्रा से दो एहम सीख मिली
1. लम्बे सफर में साइकिल चलाते वक़्त फ्लाईओवर का कम से कम प्रयोग किया जाए ,
2. सफ़र कितना ही लम्बा क्यों ना हो , पर पिछवाड़ा साइकिल की गद्दी पर टिका रहना चाहिए क्युक खड़े होकर     साइकिल  से  घुटनो में दर्द के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।

अगली कहानी
3 दिन विश्राम किया और चल दिए मोरनी............

Monday, 11 April 2016

कैसे शुरू हुआ साइकिल का सफ़र


अब कुछ काल्पनिक और वास्तविक बातों से परे साइकिल का सफरनामा लाया हूँ ।
इस सफरनामे में कुछ यात्राएँ मेरे और तरुण भाई के द्वारा की गयी , तो कुछ यात्राओ में सौरव जी का भी साथ  मिला ।
अभी पिछले 3 महीने में साइकिल पर कुछ 5-6 जगह घुमा जा सका ।

वैसे तो साइकिल चलाना पिछले 15 साल से ही प्रिय है ,
आज भी याद है जब मैं तीसरी कक्षा में था और पिताजी ने इसी शर्त पर साइकिल दिलायि थी की चौथी में 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने होंगे ।
मन तो बचपन से ही चंचल था ,ये समझ लिजिए की अभी यहाँ और अगले ही पल जाने कहाँ ?
90 प्रतिशत की दौड़ में भगाने के लिए पिताजी ने साइकिल दिलाना मुनासिब समझा ।
अंक आये भी क्योंकि बचपन बहुत सरल होता है 
लेकिन धीरे धीरे क्लास में नंबर घटते रहे और रैंक बढ़ती रही पर साइकिल का साथ कभी ना छूटा ।

अब  पिछले ही वर्ष जुलाई में मास्टर्स की पढाई में एडमिशन लिया ।
4 वर्ष की अभियांत्रिकी की पढाई के दौरान बहुत से साथी बने, उन्ही में से एक थे - सौरभ जी ।
सौरभ जी वही व्यक्ति है जो चण्डीगढ़ से अपने घर जिला काँगड़ा तक साइकिल से 253 किलोमीटर यात्रा करके एक ही दिन में इतिहास के कोरे पन्नों पर अपनी साइकिल गाथा को लिख चुके है ।

बी.टेक  के समय से ही उनसे घनिष्ट मित्रता हो गयी थी, उस समय मैं और सौरभ कुछ अन्य साथियो के साथ हिमाचल के कुछ क्षेत्रो में वैन विहार के कार्यक्रम के लिए गए थे - दगशायी , चायल 
आदि स्थानों पर घूमना हुआ था ।



डगशाई का स्कूल 
सौरभ जी 


















सौरभ जी एक एथलीट व्यक्ति है , समाचार मिला के सौरभ जी अपने घर साइकिल पर ही चले गए , तो खुद से एक सवाल किया के क्यों ना एक साइकिल खरीद ली जाए और उससे घूमा जाए 







ग्रेजुएशन कॉलेज पंजाब के मोहाली जिले में था परंतु
मोहाली के अतिरिक्त , पंजाब के किसी अन्य स्थान पर घूमने का सौभाग्य प्राप्त ना हो पाया ।
एक बार कॉलेज की तरफ से भाकरा नंगल डैम गये थे तो आनंदपुर साहिब गुरिद्वारा में प्रशाद ग्रहण किया था ।

जुलाई 2015 में फिर से चंडीगढ़ में एडमिशन लिया।
26 बच्चों की क्लास में एक व्यक्ति ऐसा मिला जो भारत दर्शन का अटूट प्रेमी था ।
घूमने फिरने का ऐसा शौंक कभी किसी में नहीं देखा। मतलब एक पर्यटनप्रेमियो की सूची बनाओ तो जनाब टॉप मार देंगे।
जनाब की 30 साल की उम्र में कम से कम से 300 से अधिक अलग अलग जगह घूमने के किस्से है जो एक वेबसाइट पर भाई साब ने डाले  है , वेबसाइट का नाम है www.tarungoel.in
ये कश्मीर से कन्याकुमारी तक पर्यटन करके अनेक स्थानों के अनुभवो को , छोटी बड़ी बातों को साँझा कर चुके है पर इनके और बाकी सभी पर्यटनप्रेमिओ के मन की तृष्णा कभी समाप्त नहीं हो सकती क्योंकि ये हमारी भारतभू ,एक ऐसा स्थान है जिसे ठीक तरह से देखने के लिए कुछ साल और उम्र तो क्या ना जाने कितने जनम भी कम पढ़ जाए।


इतने सारे प्रान्त, भाषाए , बोलिया , सभ्यताएं, अनन्य संस्कृतिया, ऋतुएँ , पर्वत श्रृंखलाएँ , नदिया ।
इतना कुछ है की जिसका वर्णन करना भी असंभव ही समझो, कहीं ऊँचे ऊँचे बर्फ से ढके पहाड़ तो कहीं धूप  से तप्ते रेगिस्तान, कहीं विश्व में सरवाधिक वर्षा होने वाला चेरा पूँजी जैसा स्थान ,तो चारो ओर समुद्र से घिरा अंडमान निकोबार द्वीप और सर पर विशाल आसमान ।

खैर  ,बात चली थी साइकिल पर और फिर ना जाने कहा पहुँच गयी ।
तो तरुण जी के साथ हिमाचल के चूड़धार और पोंटा साहिब जैसे स्थानों पर घुमने का मौका मिला ।
जिनके अनुभवो को कभी और आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा ।
फिर सर्दिया आ गयी और स्वास्थ को दुरुस्त रखने के लिए तरुण जी ने साइकिल खरीदने के रट लगा ली।
बहुत विचारविमर्श के बाद फ़ायरफ़ॉक्स की एक साइकिल रूम पर आ गयी ।
जिसे हम दोनों अलग अलग समय पर चलाया करते थे ।
पर ये किसी को नहीं नहीं पता था की हमारी राहों की हमसफर ये साइकिल ही एक दिन कहानियो और चर्चा का विषय बन जायेगी ।
साइकिल महंगी थी लेकिन सपनो की कोई कीमत नहीं होती।
सर्दियो की छुटियों में तरुण जी अपनी फ़ायरफ़ॉक्स की अमानत मुझे सौंप गए।
खूब चलायी खूब दौड़ाई 
इसी बीच सौरभ जी ने भी साइकिल ले ली थी , फिर कभी मैं सौरभ जी के कॉलेज तो सौरभ जी कभी मेरे कॉलज
कुछ दिन बाद जब कॉलेज खुलने वाले थे तो तरुण जी को भी सौरभ जी के साइकिल पर घर जाने का समाचार  मिला ।
तरुण भाई की मुलाकात सौरभ जी से मेरे द्वारा हुई थी और हम साथ ही चूड़धार गए थे ।

चूडधार का एक अदभुत नजारा 

तरुण भाई के घर से वापस आने से 2 दिन पहले मैं अपनी पहली स्कॉलरशिप से एक हरक्यूलिस की साइकिल ले आया और तैयार हो गया आस पास के क्षेत्रों की दूरिओ को कम करने के लिए और फिर सफरनामा कुछ इस बरकरार 
1. पहली साइकिल यात्रा - श्री आनंदपुर साहिब
2. मोरनी की अधूरी यात्रा
3. छप्पर चिड़ी - सिख साम्राज्य का अहम पृष्ठ
4. सिसवाँ  डैम और शीश महल गुरुद्वारा
5. फतेहगढ़ साहिब और ऊँचा पिंड संघोल
6. धर्मक्षेत्र - कुरुक्षेत्र की शतक  वाली यात्रा

जल्द ही सुनियेगा आनंदपुर साहिब की साइकिल यात्रा।।

तरुण जी 



Sunday, 3 April 2016

JK 20 P 420 भाग 2


तभी मैंने धीमी सी आवाज़ में उससे कहा -
'जरा खिड़की को बंद करेंगी 'और उसने बिना कुछ कहे सहेजता से खिड़की बंद कर दी ।
सूरज के छिपने के बाद ठण्ड बहुत बड़ गयी थी ऐसा पहाड़ी क्षेत्रो में अक्सर देखा जाता है ,
और खिड़कि से आती हुई शीतल हवा के साथ उसके उड़ते हुए बाल मेरे मुह पे आके ऐसे लग रहे थे , माँनो फूलों से कोई मेरे गालो को गुदगुदा रहा हो, लेकिन कुछ संवाद का सूत्र बने इसलिए मैंने उसे खिड़की बंद करने को  कहा ।
उसने खिड़की बंद करने के बाद अपने बालो को जैसे ही बाँधा तो उसकी सूरत की एक झलक दिखाई दी
बस फिर क्या था ?? मैं फिर से बावला हो गया उसकी खूबसूरती देख ।
अब सोचा की कुछ बात कर ही ली जाए तो
मैंने उसे पहले रास्ते के बारे में पूछा ,
उसने मेरे सभी प्रशनो  का उत्तर तो बखूबी दिया
लेकिन खुद मुझसे से कोई सवाल ना किया,
बस तो 3-4 बातों के बाद मैं भी शांत हो गया।
एक मौन जो वो धारण करे बैठी थी काफी समय से, बिलकुल वैसा ही मौन , मैं भी  अपने अंदर धारण करके दूसरी ओर खिड़की से भार, खूबसूरत पहाड़ो को निहारता रहा ।
भूल गया के मेरे साथ सीट पे कोई और भी बैठा है ।
और इतने में एक झटका लगा और आँख खुली।
हाँ जी , आँख खुली क्योंकि एक छोटी सी नींद की झपकी लग गयी थी ,
आँख खुलने पर ये जान पाया की मेरी 'कुछ दूरी की हमसफ़र' मेरे कंधे पर सर रख कर इतने सुकून से सो रही थी मानो बरसो का साथ हो ।
और तो और झटको से उसकी नींद को रत्ती भर भी फरक नहीं पढ़ा ।
अभी जम्मू कुछ दूर था , थकान भी काफी थी ।
पर अब मुझे नींद कहा आने वाली थी ???
पहले सोचा की उसका सर जो मेरे  कंधे पर था उसको सीधा कर देता हूँ,
फिर सोचा के उसे आवाज़ देके जगा देता हूँ।
पर मुझे उसका नाम भी नहीं पता था , करूँ तो क्या करूँ???
ऐसा  अजीब एहसास पहली बार हो रहा था ।
कुछ समय तक मैं बैठे बैठे भी सावधान की मुद्रा में रहा,
मानो एक ज़िम्मेदार नागरिक राष्ट्रिय गान के वक़्त सावधान खड़ा रहता हो,
साथ की कुछ सीटे भी खाली हो गयी थी लेकिन वो मैडम इस तरह सो रही थी की मेरे  उठने से वो गिर भी सकती थी,
मैंने उसका सोते रहना ही मुनासिब समझा और मैं फिर प्रकर्ति को निहारने में तल्लीन हो गया ।
आस पास की पहाड़ियों पर जगमगाती लाइट , अपने अपने घर को वापस लौटते पक्षी , तावि नदी में तेज वेग से हिलोरे लेता जल और उस वो रास्ता , सब कुछ इतना मनमोहक लग रहा था ।
अब जम्मू तो आ गया था लेकिन चाहत यही थी की ये सफ़र कभी खत्म ना हो ।
एक झटका फिर लगा , ड्राईवर ने अचानक से ब्रेक लगायी थी,
कंडक्टर जोर से बोला
नगरोटा वाले , अम्फला वाले , बड़ी ब्रह्मा वाले , बस स्टैंड वाले ,सबको यही उतरना पड़ेगा ।
ये बस  आगे नहीं जायेगी  ।
कुछ प्रदर्शनकारियो ने बसों के लिए रास्ता बंद किया हुआ था ।
कंडक्टर ने बताया की प्राइवेट बसों और 'सरकारी परिवहन सेवा' के कर्मचारियों की लड़ाई चल रही है और राष्ट्रपति शासन के चलते कोई फैसला भी नहीं हो पा रहा है , इसलिये प्राइवेट बस आगे नहीं जा सकती।
अब इसमें हम यात्रिओ का क्या दोष???
कंडक्टर की आवाज़ से साथ बैठी वास्तव में सोती हुई लड़की उठ गयी,
जागने पर जब उसने मेरे कंधे पर अपना सर देखा,
तो उसने मुझे मिश्रित भाव से देखते हुए कहा -
आपने मुझे उठाया क्यों नहीं , मैं कब से सो रही थी ???
अब मैं क्या कहता ? :(
मैंने कहा - आपके उठने से 5 मिनट पूर्व ही मेरी आँख खुली है ।
वो लड़की ना जाने क्यों, कुछ मुस्कुराई और चली गयी ।
समझ ना पाया ????
के उसने हँस के देखा या देख के हँसी क्योंकि
बस कंडक्टर की बातों से मैं इस चिंता में डूब गया था , की अब 50 मिनट में 30 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन की दूरी कैसे पूरी होगी ?
फिर मैं बस से उतरा और लोगो से पूछने लगा के कोई साधन मिल जाए रेलवे स्टेशन जाने का ??
आर्मी कैंट का इलाका था शाम काफी हो चुकी थी
मैं हताश था क्योंकि बस से उतरे हुए 15 मिनट बीत चुके थे और स्टेशन जाने का कोई साधन नहीं दिख रहा था, बस से उतरी साथी सवारिया भी जा चुकी थी।
मैं सड़क किनारे एक माइलस्टोन पर बैठा की , एक सफ़ेद रंग की स्कूटी आई जो कुछ कदम आगे जाके रुकी ।
आगे से आवाज़ आई - "चलो रेलवे स्टेशन"
आवाज़ जानी पहचानी लग रही थी, पर इस अनजान शेहेर में जानता ही कौन है मुझे ।
मैं सामान उठा के भागा
देखा हेलमेट के शीशे के पीछे वही बस वाला चेहरा था ।
ख़ुशी का कोई ठिकाना ना था,
स्कूटी पे बैठे पहले 2 मिनट कुछ बोल ना पाया
सोचता रहा इसे कैसे पता चला होगा के मुझे स्टेशन जाना है ??
फिर बात चीत शुरू हुई ,उसी ने कहा आपका क्या नाम है ?
उसका नाम नैमत था , नैमत कॉल -कश्मीर से , एम्.ए पोलिटिकल साइंस की छात्रा ,
पिता - आर्मी अफसर।
करीब 23 मिनट में नैमत ने बड़ी तेजी के साथ मुझे स्टेशन पहुंचा दिया ,
और वो 23 मिनट के सफ़र में हमने वो सभी बातें कर ली जो हमारे साथ 23 साल में हुई थी ।
सभी बातें तो नहीं लेकिन 23 सालो का एक सार , एक दुसरे के सामने खोल कर रख दिया।
फिर स्टेशन पहुंच के लगा के इस दोस्ती को आगे बढ़ाया जाए ,
तो उतरते वक़्त मैंने नैमत से उसका नंबर माँगा,
उसने अपना नंबर तो ना दिया लेकिन मेरा नंबर अपने हाथ पे लिख लिया।
और कहा मैं एक दिन जरूर फ़ोन करुँगी ,
वो चली गयी , चंद मिन्टो में रेलगाडी भी चल पढ़ी,
सफ़र सफल सा लगा भी और नहीं भी ,
लेकिन यही सफर है ।
कुछ खट्ठी मीठी यादों का सफ़र ।।।। :)

Friday, 25 March 2016

यादों की पोटली से कुछ कहानिया

JK 20 P 420 , रियासी to कटरा to जम्मू भाग - 1




'भैया थोडा साइड होना'
आखिरी सीट पे बैठे हुए तीन दोस्तों में से एक से मैंने कहा
इतना कहते ही उसने  मेरी तरफ, इस तरह देखा
जैसे मानो ,मैंने उससे उसकी सीट नहीं बल्कि किडनी मांग ली हो
खैर, ये रिएक्शन देखने की,अब तो आदत सी हो गयी है
क्या करूँ मुसाफिर जो हूँ
हज़ारो किलोमीटर की यात्रा में,
सौइयो तरह के लोग मिलते हैं,
पचसियो से बात होती है,
20 अच्छी , 20 बुरी
10 ऐसी भी होती है जिनका कोई सर पैर नहीं होता पर होती जरूर है ।
क्योंकि इसका नाम सफ़र है ,
और सफ़र में suffer भी करना ही पडता है
कोई  ऐसे भी लोग मिलते है ,जो मिलते ही एक सवालो का बैग खोल देते है।
कहाँ से आ रहे हो?
कहाँ रहते हो क्यों रहते हो ???
क्या करते हो ??
ये क्यों नहीं करते ??
हजारो सवाल,
कभी कभी तो इतना पूछ लेते है की
अगर इतना कभी पढाई के लिए याद कीया होता तो शायद आई.ए.एस बन गए होते आज ।
और ये केवल बस  की बात नहीं है ,
आप ट्रेन में जाओ या मेट्रो ट्रेन  में ,
हर जगह हर समय ऐसा ही सब कुछ होता है ,
क्योंकि ये भारत है मेरे दोस्त,
और अब इन सब चीज़ों की इतनी आदत सी हो गयी है कि इनके बिना सफ़र असफल सा लगता है ।
खैर मैं भी भटका हुआ राही हूँ


शुरू हुआ था JK 20 P 0420 की बात से और पहुँच गया पूरे भारत की बात पर ।
तो कुछ यूँ हुआ
के जैसे ही मैंने अपनी तशरीफ़ बस की आखिरी सीट पे टिकाई,
बचपन के दिन याद आ गए ,
जब हम  पजल वाले गेम के टुकड़ो को जबरदस्ती जोड़ने की कोशिश करते थे और मैं वो ही पजल का टुकड़ा बन बैठा , जिसको जोड़ने की कोशिश बस कंडक्टर कर रहा था ।
बस में जैसे जैसे भीड़ बढ़ती रही, ऑक्सीजन की मात्रा घटती रही।
फिर कुछ देर में आगे वाली सीट पे बैठे एक अंकल ने एक तीख़ी सी आवाज़ निकाली ,
पर अफ़सोस की  वो आवाज़ उनके मुह से नहीं निकली थी ।
और चंद ही मिनटो में ज़ेहर पूरी बस में फैलता इतने में बस चल पढ़ी।
बस चली और हवा का आवागमन होने लगा
शाम का समय था और रास्ता पहाड़ी था,
एक पहाड़ से दुसरे पहाड़ , कभी पहाड़ बायीं तो कभी दायीं ओर,
पूरे रस्ते यही चलता रहा ,ठण्ड काफी थी ।


बस में हो रही चहल पहल से परे,आसमान में कोसो दूर जो नजारा था, वो मेरे बोझल मन को हल्का कर रहा था ।
एक तरफ तो विशालकाय सूरज पहाड़ो के पीछे धीरे धीरे आँखों से ओझल हो रहा था
और वही दूसरी ओर 'चाँद' सैकड़ो तारो के साथ उसके ओझल होने की घात लगाए बैठ था |
वो चाँद जो तारो से जगमगाते आस्मां में खूबसूरती से  पैठ कर रहा था
उसको देखते देखते मैं ना जाने किस  ख्वाब में खो गया और ख्वाब टूटा एक झटके के साथ।
सीट आखिरी थी पर झटके आखिरी नही
ना जाने इस पहाड़ी रस्ते में कितने झटके और बाकी थे ??
बस ड्राईवर ने जोर से ब्रेक मारी और आधी सवारियां अपनी सीट से थोडा इधर उधर हो गयी
तभी एक दुसरे चाँद की झलक दिखाई दी
ये चाँद मुझसे कोसो नहीं बल्कि कदमो दूर था
बस रुकी और एक पहाड़ी लड़की ने बस में प्रवेश किआ
उसकी सुंदरता को देख सबकी आँखों के तारे टिमटिमाने लगे ।
उसके चेहरे पे मदहोश कर देने वाली एक अद्भुत चमक थी ।
जैसे पौं फटने के समय आस्मां में होती है।
ऐसी अनोखी सुंदरता जिसको बयान करने में अच्छे अच्छे लेखक भी निशब्द हो जाए,
और उस चेहरे की झलक से ही सफर का suffer होना खत्म हो गया |
बस में बहुत भीड़ थी और उस भीड़ में भी कुछ आशिक़ मिजाज़ लोगो ने उस लड़की को अपनी  सीट देने की मंशा जताई ।
पर उसे भी सीट पे बैठना गवारा ना हुआ और अशिक़ो की कोशिश नाकाम रही ।
वो कुछ देर तक खड़ी रही और मैं भी टुकटुकि लगाये उसे चुपके से निहारता रहा
बस में अँधेरा था , पर फिर मेरी आँखें उसके हुस्न के दीदार में जुटी हुई थी ।
फिर बस कुछ दूर चल के रुकी , एक बसस्टॉप आया था ।
आधी बस खाली हो गयी और वो लड़की एक खिड़की वाली सीट पे जाके बैठ गयी ।
मैं भी उस निरंतर झटके देने वाली आखिरी सीट से उठा और उसके साथ  जाकर बैठ गया ।
इरादा नेक था और मन में भी ख्याल एक था
के काश इस लडकी से रूबरू होने का मौका मिल सके इस पहाड़ी सफ़र में
मैंने उसे मन ही मन, मानो उसे अपनी किस्मत में लिखा जीवन भर तक साथ देने वाला एक लेख मान लिया हो
वही लेख जो हर किसी की किस्मत में लिखा होता है।
उस से बात करने की मन को बहुत लालसा थी ,
तभी मैंने धीमी सी आवाज़ में उससे कहा....


कहानी में आगे क्या हुआ , जानने के लिए यहाँ दबाए

Tuesday, 22 March 2016

आखिर क्या चाहता है ये मन ???

आखिर क्या चाहता है ये मन ???
के उन मायूस चेहरो पे मुस्कान के दो फूल खिल सके
जो वंचित थे ज्ञान और अज्ञान के बीच अंतर से ।
आखिर उनके कोमल हाथो में , कलम की जगह मेहेज 10 रुपए में बिकने वाला कमल क्यों है ???
कोई अपने हाथ में कपडा लेके गन्दी गाडियो के शीशे साफ़ कर रहा है,
कोई हाथ में भारत का झंडा , कोई सफ़ेद फूलों से निर्मित सुंगधित गजरे ,
तो कोई कागज़ के टीसु पेपर बेच रहा है ,
क्या इस  टिशू वाले कागज़ की बजाए वो कोपि किताब वाले कागज़ों से रूबरू होने का हक़ नहीं इन नन्हे बचपन के व्यापारियो को ??


ये व्यापार नहीं करते, ये तो जीवन व्यापन के लिए इधर से उधर अपने बचपन को कोड़ियो के भाव बेच रहे है
इनके साहस और निश्चय का कोई माप नहीं है
मैनेजमेंट के  विद्यार्थी भी इतनी अच्छी मार्केटिंग नहीं कर सकते क्योंकि वो इतने सक्षम नहीं होते जो रोज रोज की नामंजूरी के बाद समाज में अपना  कदम रख पाए ।
धैर्य चाहिए होता है , हज़ारो लोगो के सामने रोज अपने सामान को बेचने में
वो भी तब , जब हज़ारो में से कुछ चंद ही इनका सामान खरीद के वो अतुलनीय मुस्कान की झलक पाते है
बारिश हो , कड़ी धूप या कड़ाके की ठण्ड कोई भी ऐसी चीज़ नही जो इनके हौसले को कुछ षण के लिए भी पस्त कर दे



पर सवाल ये है की  क्या इनका ये  नन्हा बचपन इसी जद्दोजेहद में बीत जाएगा ???
आखिर क्या चाहता है ये मन
क्या कुछ हो सकता है ?
क्या कुछ किया जा सकता है ?
एक सवाल अपने मन से
आखिर क्या चाहता है ये मन???