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Tuesday, 14 June 2016

मोरनी - एक अधूरा सफर

चलो कहीं और घूम कर आते है , लेकिन इस बार कहीं आस पास चलेंगे - मैंने तरुण जी से नाश्ता करने के बाद कहा।

सुबह के साढ़े 8 बज  रहे थे , और बातों बातों में मोरनी जाने का मन बना लिया।
अभी आनंदपुर से आये हुए ठीक से  3 दिन भी नहीं हुई थे , शरीर में कहीं कहीं थोड़ा दर्द भी था लेकिन दिल पक्का था।  क्योंकि वो 'बस के द्वारा' की गई वापसी किसी नाकामी से कम भी तो नहीं लग रही थी।
शरीर को मज़बूत बनाने के लिए दिल को पहले ही मजबूत कर लिया था, जिससे कभी बस से आने पर मजबूर ना होना पड़े। जब गए साइकिल से थे तो आएंगे भी वापस साइकिल से।  आपको ये सब बातें समझने में दिक्कत हो रही होगी क्योंकि आपने शायद श्री आनंदपुर साहिब यात्रा न पढ़ी हो।

 फ़ोन में मोरनी का सबसे छोटे रस्ते वाला मैप डाउनलोड किया , दाना पानी  लिया और 10 बजे हम दोनों साथी अपनी अपनी साइकलों पर मोरनी के लिए चल दिए। सेक्टर 26 , चण्डीगढ़  से पंचकूला से होते हुए , हिमालयन एक्सप्रेसवे पर पहुँचते - पहुँचते शरीर थोड़ा बहुत खुल गया था तो हमने गति तेज कर ली।
खुला हुआ चौड़ा रास्ता , तेजी से हिमाचल की ओर अग्रसर होते वाहन अधिक समय तक  हमारा साथ नहीं दे पाये, और हमें  एक्सप्रेसवे से मोरनी के लिए मुड़ना पढ़ा।
पहले कुछ दूर तक भगवानपुर नामक एक छोटा सा गॉंव साथ चला।
फिर सड़क के दोनों तरफ़ बड़े बड़े क्रेसर दिखाई देने लगे , क्रेसर और ट्रकों को जल्द ही  पीछे छोड़ते हुए हम एक ऐसे  रास्ते पर पहुँच गए जिसपर गाडिओं और बाकी वाहनों का आवागमन काफी कम था।
रास्ते का पहला पुल 
खुला मनमोहक रास्ता 
एक तरफ छोटे छोटे पहाड़ , तो दूसरी ओर  एक दरिया में पतली सी पानी की धार दिखाई दे रही थी,वास्तव में वो दरिया भू खनन से प्रभावित जमीन का कुछ हिस्सा था।
उस सूखे दरीया से कुछ दूर पहाड़ दिखने लगे थे और सर्दियों के सूरज ने हमे ऊपर से  घेर लिया था।

करीब 3-4 किलोमीटर तक ये मनमोहक खुला रास्ता साथ रहा फिर एक छोटा सा गाँव आया और वह से पतला रास्ता शुरू हो गया।
अब दोनों तरफ हरी भरी फसल से लहराते खेत थे और बहुत मामूली सी चढाई शुरू हो गई थी। थकान का एहसास शरीर को होने लगा था तभी हमे दोनों साथी  एक घर के पास रुके, पानी लिया और 10  मिनट विश्राम किया।
घर के मालिक से बातचीत हुई और पता चला  की मोरनी  अभी भी 17 -18   किलोमीटर दूर है , उन्होंने कहा यहाँ से 25-30 मिनट लगेंगे क्योंकि उन्हें ये जानकारी नहीं थी हम तो साईकल से जा रहे है।
जल ही जीवन है 

फिर कुछ  दूर चले तो दो अलग अलग रास्ते दिखाई दिए।  एक सरल सा रास्ता  था जो नीचे दरिया से होते हुए हलकी हलकी पहाड़ियों में जाके मिल रहा था और दूसरा रास्ता आगे से मुड़ रहा था जो ठीक से दिखाई भी नहीं दे रहा था। मोड़ पर रुके तो एक आदमी मिला जिससे पुछा- भैया मोरनी के लिए कौनसा रास्ता  जायेगा ?
इतना कहते ही उसने हमें ऐसे देखा मानो किसी और देश  से आये हो। वो हँसा और बोला की इस मोड़ से मुड़ जाओ।
उसकी हँसी  को दिल पर न  लेते हुई मैंने  शरीर पर ले लिया,साइकिल के पैडल में सारा जोर  फूंकना शुरू कर  दिया  और तेजी से मोड़  से मुढ़ गए , कड़ी चढ़ाई की शुरुवात हो गई।
गियर 6 से उतर कर सीधा 1 पर जाके रुका क्योंकि कुछ ही मिनट में सड़क इतनी खड़ी हो गई की पहला गियर भी ऐसा लग रहा था मानो किसी ने 100 किलो वजन पीठ पर लाद कर साइकिल का छठा गियर दाल दिया हो।
सौ सवा सौ मीटर तक साइकिल चलाई फिर उतर कर हाथ से खींचनी शुरू कर दी।
मैं आगे था और तरुण भाई पीछे से साइकिल पर आते हुए मुझ पर हँसे , लेकिन उनकी हँसी भी पचास मीटर की ही मेहमान थी उसके बाद वो भी उतर गए और हम साथ साथ चलने लगे।
गाते गुनगुनाते कुछ 300 मीटर चले और फिर चढ़ाई कुछ कम हो गई , फिर साइकिल पर बैठ गए लेकिन वो साइकिल का सुख फिर 1 -1.5  किलोमीटर तक ही था , फिर उतरे और विश्राम किया। उन पलो को कमरे में कैद किया।
कुछ सोचते हुए 

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आस पास कुछ और लोग जो  उस रास्ते से मोरनी जा रहे थे उन्हें भी ऐसा लग रहा था की हम किसी और देश से हैं और अब उस रास्ता बताने वाले पहले आदमी की हँसी बखूबी समझ आ रही  थी , बिलकुल वैसी ही हंसी हमारे चेहरों पर एक दूसरे  को देख कर आ रही थी।
"जब ओखली  में सर दे दिया तो मूसल से की डरना"-बस एक इसी भाव के साथ साइकिल और पैदल चलने की मिश्रित प्रक्रिया चालू रही।
 
फिर चढ़ाई , फिर साइकिल से उतरकर पैदल चलना , फिर साइकिल पर चढ़ना और फिर  कुछ दूर तक पैडल मारकर साइकिल  को खींचना। ऐसा करते करते हम फिर एक मोड़ पर पहुंचे जहां से एक रास्ता मोरनी को जाता था और दूसरा पिंजौर को ,वह कुछ दुकाने थी जिनसे  मैगी और चाये का सेवन किया और पता चला की अभी भी मोरनी 9  किलोमीटर आगे है। 


दोपहर के 1 बजे  रहे थे और मैंने मन बना लिया की 2:00  तक मोरनी पहुँच के रहेंगे। रास्ते में शरीर ने तो  जवाब नहीं दिया लेकिन 1:45  पर मन जवाब  दे गया और मोरनी से 6 किलोमीटर पीछे पीछे से ही वापस लौटने का मन बना लिया।
दोनों साथी सर्व सहमति से  6 किलोमीटर पीछे से ही वापस लौट गए।
अब वो रास्ता जो कांटो की तरह पैरों में चुब  रहा था वो फूलों की तरह कोमल और सुन्दर लगने लगा।
जिस चढाई वाली  दूरी को हमने 2.5  घंटे में पूरा किया  वो 20 मिनट में तय कर ली , साइकिल हवा से बातें करने लगी , उत्तराई इतनी तीखी थी की ब्रेक लगाने पर भी साइकिल रुक नहीं रही थी , वापसी में कोई दुःख का एहसास ना था और कुल 1.5 घण्टे जैसे तैसे करके हम हॉस्टल वापस  आ गए और ले आये वो यादें जो  अतुलनीय थी।
प्रकृति की गोद में एक लम्हा 

वापसी में ख़ुशी का एहसास  

अधूरे सफर में भी किला फ़तेह का एहसास 

प्रकृति की गोद में बैठने का एहसास कराया मोरनी क अधूरे सफर ने।  जीवन में बहुत बार हम मन चाही वस्तुओं को हांसिल नहीं कर पाते , लेकिन उनके पीछे किये गए परिश्रम से बहुत कुछ सीखने को मिलता है,
मोरनी  का अधूरा सफर भी उन्ही में से एक सफर बन के रह गया जो अधूरा होने पर भी खूबसूरत और अद्भुत था ।
इन्ही सब बातो को एक दिन अपने तीसरे साथी सौरभ जी से साँझा किया , उनका झट से जवाब आया - फिर से चलें क्या ??
मैंने कहा महाराज हाथ जुड़वाँ लो।

लेकिन वो मानने वालो में से  कहाँ है ? लोहे की टाँगे और हीरे का दिल है , हीरा इसलिए क्योंकि वो सबसे स्ट्रांग कार्बन पदार्थ  है।
अकेले चल दिए मोरनी।
आखिर मोरनी में है क्या ?
वह क्यों जाना ?
इन सब बातो को जानने के लिए पढ़िए मेरे साइकिल गुरु सौरभ जी का ब्लॉग ?
चंडीगढ़ से मोरनी हिल्स (टिक्कर ताल) यात्रा


जल्द ही आऊंगा चप्पर चिड़ी की साइकिल यात्रा और चप्पर चिड़ी के एतिहासिक महत्त्व के साथ।

नमस्कार ।।




Tuesday, 10 May 2016

पहली साइकिल यात्रा - श्री आनंदपुर साहिब


जनवरी का महीना पूरे उत्तर भारत में शरद ऋतू का दूत कहलाता है।  ठण्ड इतनी ज्यादा होती है की घूमना फिरना तो दूर ,व्यक्ति  अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी घर से बाहर निकलना पसंद नहीं करता , लेकिन मेरी  मानो तो साइकिल चलाने  के लिए ,इससे अच्छा कोई और समय नहीं हो सकता।  यही सब सोचते हुए 15 जनवरी को साइकिल खरीद ली और 18 से कॉलेज भी खुल गए थे , अब तो तरुण भाई भी घर से वापस लौट चुके थे।  कुछ 4 - 5 दिन सुबह 10 -15 किलोमीटर  साथ में साइकिल चलाने के बाद विचार आया की, कहीं लम्बी यात्रा हो जाए तो हम लोगों  का साइकिल खरीदना सफल हो जाएगा और सौरभ जी, जो की एक दिन में  253 किलोमीटर साइकिल चला चुके थे , उनका साथ तो था ही।  तरुण जी के मन में पंजाब और चंडीगढ़ के आस पास के उन इलाको को घूमने की बड़ी लालसा दिखाई देती थी - जो सिख इतिहास के पन्नो के अहम पृष्ठ है। उन्ही में से एक स्थान है श्री आनंदपुर साहिब। 

श्री आनंदपुर साहिब - एक ऐसी पावन  धरा जिसकी  नींव दसवें गुरु श्री गुरुगोबिंद सिंह जी ने रखी थी,
यही वो पवित्र स्थान है जहाँ दशमेश पिता ने पंज प्यारों का बलिदान स्वीकार  कर खालसा पंथ की  स्थापना करी थी इसलिए इसे तख़्त श्री केशगढ़ साहिब नाम दिया गया। वैसे तो आनंदपुर साहिब की स्थापना 1665 में नौवें गुरु श्री तेग बहदुर जी द्वारा की गयी और उन्होंने अपनी माता के नाम पर इसका नाम दिया - "चक नानकी ", लेकिन बाद में दशमेश पिता श्री गुरुगोबिंद सिंह जी  ने  25 वर्ष आनंदपुर साहिब में बिताते हुए यहाँ आस पास अनन्य किलों का निर्माण किया जो सक्षम थे मुग़लों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए। इन्ही सब बातों को जानने के लिए आनंदपुर साहिब जाने का मन बनाया। 

22 जनवरी , शुक्रवार का दिन तय हुआ, सुबह कॉलेज में लेक्चर अटेंड किये और दोपहर 1 बजे हम हॉस्टल से चल दिए , करीब 5  किलोमीटर बाद पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचे और वहा  से सौरभ जी को साथ लेते हुए निकल पढ़े आनंदपुर सहिब के लिये।
3 दोस्त 3 साइकिल और एक मंज़िल - साईकल पर जीवन का  पहला ट्रिप था और मुझे ठीक से दूरी का भी नहीं पता था, बस चलते गये ,चलते गए। पहले चंडीगढ़ में और अब कुराली के लिए।  
चंडीगढ़ कुराली रोड था तो 4 लेन हाईवे,  लेकिन तेज़ी से चलती हुई गाड़िया , ट्रैक्टर ,बुग्गियां हमें सतर्कता से चलने का संदेश बार बार दे रही थी। 
करीब 1 घंटा साइकिल चलाने के बाद हम कुराली-चंडीगढ़ रोड पर ठीक उसी जगह रुके जहां से हमारा (मेरा और सौरभ का) पिछला कॉलेज कुछ ही किलोमीटर दूर था.

गुड कारखाना 
सौरभ जी कैमरे का और मैं गुड का लुफ्त लेते हुए 

रुकने का कारण था 'गरम गुड' 
इस रोड पर अनेकों गुड़ बनाने के कारखाने थे , एक पर हम रुके ,गुड़ खाया और फिर रोपड की तरफ़ चल दिए,
2:30 बजने पर जब गुड़  खा कर चले तो कुछ स्थानीय स्कूली बच्चों से रेस लगाई , कुछ दूर तक तो खूब तेज़ चलाई पर अंत में बच्चों ने हरा दिया , बच्चों में बहुत ताकत होती है और हम पिछले 25  किलोमीटर से साइकिल भी तो चला रहे थे, बातों बातों में कुराली पहुँच गए। 
30  किलोमीटर साइकिल चलाने के बाद थकान का एहसास होने लगा था, धूप तो थी ही लेकिन सर्दियों वाली। 
टी-शर्ट पसीने से लत पत , मुंह पे मिटटी की परत , पैरो में मीठा मीठा दर्द और कुछ साथ में  चलते लोग,
कोई साइकिल पर , कोई  स्कूटर, कोई बस , कोई गाडी तो कोई बैल गाडी में , सभी प्रकार के लोग मिलते और आगे निकल जाते। कोई देख कर हस देता, तो कोई हस कर देखता, लोगों के निरन्तर मिलते सकारातमक भावों से आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती रही  , लेकिन शरीर तो जवाब देने लगा था।

3:45बजे करीब 50 किलोमीटर साइकिल चलाने के बाद , एक जगह रुके और कीनो जूस पिया , ताज़गी का एहसास कुछ ही किलोमीटर तक साथ रहा, फिर सोचा की सौरभ की रेसिंग साइकिल से सफर पूरा कर लिया जाए।
मेरे पहले ही आग्रह पर सौरभ जी मना न कर पाये और मुझे अपनी साइकिल दे दी।
हीरो हॉक - जिसकी सख्त और ऊँची गद्दी थी , उस पर सवार हो कुछ 5 - 7 किलोमीटर का सफर और तय कर लिया, सौरभ जी की वो साइकिल थी तो झर झर हालत में लेकिन चलती बहुत तेज थी  है , उस गंजे टायर वाली  हीरो हॉक की टेस्टिंग का वो पहला सफर था ।
अब दिन ढलने को था , मैं अपनी साइकिल पर वापस आया और तरुण जी के साथ चलने लगा। दोनों का यह पहला साइकिल सफर था , दोनों एक दूसरे की ओर मुस्कुरा कर देखते और मन ही मन कहते - यार ये क्या पंगा लिया ? लेकिन एक दूसरे का हौंसला कम ना हो, इसलिए नकारात्मक भावो को मन में ही समेट लेते और जुबान पर आती वो हसी जो अंतरमन से वर्तलाप कर जाती।
तरुण भाई ने पूरे रास्ते मेरा ढाँढस बढ़ाने के लिए, जगह जगह बहुत से चित्र अपने फ़ोन में कैद किये।

 भकरा से आती हुई एक प्रमुख नहर 

एन.एच. 21  पर घनौली के पास 

डूबते सूरज को सलाम 
करीब 6 बजे के आस पास सूरज भी विदाई दे गया , लेकिन हम लोग अपनी साइकिल पर पर्याप्त रौशनी करने वाले उपकरण लगा कर चले थे।
चंडीगढ़ से आनंदपुर साहिब के बीच सैकड़ो फ्लाईओवरो ने टांग की नसों को जाम सा कर दिया था और पैरो में निरन्तर बढ़ता दर्द मुझे ये कहने पे मजबूर कर गया की, रात किरतपुर में ही बिताई जाये। मेरे फैसले को मंजूरी देते हुए  , दोनों साथिओ ने मुझे आगे बढ़ने को कहा।
मैं फिर तेजी से चल पड़ा, यह सोच कर की अब कीरतपुर तो 10 किलोमीटर ही शेष बचा है , 
लेकिन मेरे आगे चलने से पीछे रहे दो साथियो की रणनीति से मैं अवगत ना था। उन्होंने  कुछ  बात करी और सौरभ जी आगे निकल गए , पीछे पीछे मैं और तरुण जी रेस जैसी लगाते हुए कीरतपुर पहुँचे , जहाँ पर विचारों का मत भेद हुआ
और 3 में से 2 लोगो ने यह फैसला किया की रुकेंगे तो आनंदपुर।
अब मैं अकेला तो कीरतपुर  रुक नहीं सकता था, इसलिए भारी मन से यह फैसला लिया की सौरभ जी की साइकिल पर अब आनंदपुर जाकर ही रुकुंगा।
आगे बढ़ते हुए द्वारिका प्रसाद महेश्वरी जी वो पंक्तिया याद कर ली जो बचपन में नंबरों की दौड़ में भागने के लिए रटी थी 
                                                  वीर तुम बढे चलो ,    धीर तुम बढे चलो
                                                   प्रात हो कि रात हो,   संग हो न साथ हो,
                                                   सूर्य से बढ़े चलो,       चन्द्र से बढ़े चलो ,
                                                   वीर तुम बढ़े चलो      धीर तुम बढ़े चलो। 

और इसी तरह करीब 7:30 हम श्री  आनंदपुर साहिब पहुँच गए लेकिन अब मुझे मेरे साथियो के द्वारा लिए गए फैसले पर अफ़सोस ना था,क्योंकि अगले दिन 10 किलोमीटर दूर आनंदपुर का आना जाना 20 किलोमीटर में बदल जाता 
साइकिल स्टैंड  पर लगा कर , धर्मशाला में सामान रख कर , श्री गुरुद्वारा के दर्शन किये , भोजन किया और सो गए। नींद बहुत अच्छी आई। 


अगले दिन वपसी करने से पूर्व हम  विरासत-ए-खालसा के लिए रवाना हो गए। 'विरासत-ए-खालसा' नाम से ही  पता लगता है की कोई ऐसा स्थान होगा जहां खालसा पंथ की विरसता छिपी हो। श्री गुरुद्वारा साहिब से कुछ ही मील दूर एक अद्भुत स्थान जिसे एक बार घूम लेने से सिख गुरुओ द्वारा समाज के लिए किये गए बलिदानो का एहसास हो जाता है। देखने में इतना सुन्दर की पूरे पंजाब  में अजूबे के नाम से प्रसिद्ध है। 

म्यूजियम में एंट्री का रास्ता 

म्यूजियम की छत से तालाब का नजारा 

वापस की तयारी 

चलो चलें वापस 
वापसी के लिए तैयार तो थे हम लेकिन तरुण भाई के घुटने में दर्द हो रहा था।  गौर से देखा तो पता चला की उनके बांये पैर का घुटना सूज गया था , अब ऐसे में 90 किलोमीटर साइकिल पर वापसी करना उचित ना था इसलिए मैं और तरुण जी बस से चंडीगढ़ वापस आये और हमारी साइकिलें  बस की छत पर।
लेकिन गौर करने वाली बात ये है की हमे बस से  वापसी करने में जहाँ 2:45 लगे वहीं सौरभ जी ने 90 किलोमीटर की दूरी को 3 घण्टे 50 मिनट में तय कर ली।

पहली साइकिल यात्रा से दो एहम सीख मिली
1. लम्बे सफर में साइकिल चलाते वक़्त फ्लाईओवर का कम से कम प्रयोग किया जाए ,
2. सफ़र कितना ही लम्बा क्यों ना हो , पर पिछवाड़ा साइकिल की गद्दी पर टिका रहना चाहिए क्युक खड़े होकर     साइकिल  से  घुटनो में दर्द के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।

अगली कहानी
3 दिन विश्राम किया और चल दिए मोरनी............

Monday, 11 April 2016

कैसे शुरू हुआ साइकिल का सफ़र


अब कुछ काल्पनिक और वास्तविक बातों से परे साइकिल का सफरनामा लाया हूँ ।
इस सफरनामे में कुछ यात्राएँ मेरे और तरुण भाई के द्वारा की गयी , तो कुछ यात्राओ में सौरव जी का भी साथ  मिला ।
अभी पिछले 3 महीने में साइकिल पर कुछ 5-6 जगह घुमा जा सका ।

वैसे तो साइकिल चलाना पिछले 15 साल से ही प्रिय है ,
आज भी याद है जब मैं तीसरी कक्षा में था और पिताजी ने इसी शर्त पर साइकिल दिलायि थी की चौथी में 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने होंगे ।
मन तो बचपन से ही चंचल था ,ये समझ लिजिए की अभी यहाँ और अगले ही पल जाने कहाँ ?
90 प्रतिशत की दौड़ में भगाने के लिए पिताजी ने साइकिल दिलाना मुनासिब समझा ।
अंक आये भी क्योंकि बचपन बहुत सरल होता है 
लेकिन धीरे धीरे क्लास में नंबर घटते रहे और रैंक बढ़ती रही पर साइकिल का साथ कभी ना छूटा ।

अब  पिछले ही वर्ष जुलाई में मास्टर्स की पढाई में एडमिशन लिया ।
4 वर्ष की अभियांत्रिकी की पढाई के दौरान बहुत से साथी बने, उन्ही में से एक थे - सौरभ जी ।
सौरभ जी वही व्यक्ति है जो चण्डीगढ़ से अपने घर जिला काँगड़ा तक साइकिल से 253 किलोमीटर यात्रा करके एक ही दिन में इतिहास के कोरे पन्नों पर अपनी साइकिल गाथा को लिख चुके है ।

बी.टेक  के समय से ही उनसे घनिष्ट मित्रता हो गयी थी, उस समय मैं और सौरभ कुछ अन्य साथियो के साथ हिमाचल के कुछ क्षेत्रो में वैन विहार के कार्यक्रम के लिए गए थे - दगशायी , चायल 
आदि स्थानों पर घूमना हुआ था ।



डगशाई का स्कूल 
सौरभ जी 


















सौरभ जी एक एथलीट व्यक्ति है , समाचार मिला के सौरभ जी अपने घर साइकिल पर ही चले गए , तो खुद से एक सवाल किया के क्यों ना एक साइकिल खरीद ली जाए और उससे घूमा जाए 







ग्रेजुएशन कॉलेज पंजाब के मोहाली जिले में था परंतु
मोहाली के अतिरिक्त , पंजाब के किसी अन्य स्थान पर घूमने का सौभाग्य प्राप्त ना हो पाया ।
एक बार कॉलेज की तरफ से भाकरा नंगल डैम गये थे तो आनंदपुर साहिब गुरिद्वारा में प्रशाद ग्रहण किया था ।

जुलाई 2015 में फिर से चंडीगढ़ में एडमिशन लिया।
26 बच्चों की क्लास में एक व्यक्ति ऐसा मिला जो भारत दर्शन का अटूट प्रेमी था ।
घूमने फिरने का ऐसा शौंक कभी किसी में नहीं देखा। मतलब एक पर्यटनप्रेमियो की सूची बनाओ तो जनाब टॉप मार देंगे।
जनाब की 30 साल की उम्र में कम से कम से 300 से अधिक अलग अलग जगह घूमने के किस्से है जो एक वेबसाइट पर भाई साब ने डाले  है , वेबसाइट का नाम है www.tarungoel.in
ये कश्मीर से कन्याकुमारी तक पर्यटन करके अनेक स्थानों के अनुभवो को , छोटी बड़ी बातों को साँझा कर चुके है पर इनके और बाकी सभी पर्यटनप्रेमिओ के मन की तृष्णा कभी समाप्त नहीं हो सकती क्योंकि ये हमारी भारतभू ,एक ऐसा स्थान है जिसे ठीक तरह से देखने के लिए कुछ साल और उम्र तो क्या ना जाने कितने जनम भी कम पढ़ जाए।


इतने सारे प्रान्त, भाषाए , बोलिया , सभ्यताएं, अनन्य संस्कृतिया, ऋतुएँ , पर्वत श्रृंखलाएँ , नदिया ।
इतना कुछ है की जिसका वर्णन करना भी असंभव ही समझो, कहीं ऊँचे ऊँचे बर्फ से ढके पहाड़ तो कहीं धूप  से तप्ते रेगिस्तान, कहीं विश्व में सरवाधिक वर्षा होने वाला चेरा पूँजी जैसा स्थान ,तो चारो ओर समुद्र से घिरा अंडमान निकोबार द्वीप और सर पर विशाल आसमान ।

खैर  ,बात चली थी साइकिल पर और फिर ना जाने कहा पहुँच गयी ।
तो तरुण जी के साथ हिमाचल के चूड़धार और पोंटा साहिब जैसे स्थानों पर घुमने का मौका मिला ।
जिनके अनुभवो को कभी और आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा ।
फिर सर्दिया आ गयी और स्वास्थ को दुरुस्त रखने के लिए तरुण जी ने साइकिल खरीदने के रट लगा ली।
बहुत विचारविमर्श के बाद फ़ायरफ़ॉक्स की एक साइकिल रूम पर आ गयी ।
जिसे हम दोनों अलग अलग समय पर चलाया करते थे ।
पर ये किसी को नहीं नहीं पता था की हमारी राहों की हमसफर ये साइकिल ही एक दिन कहानियो और चर्चा का विषय बन जायेगी ।
साइकिल महंगी थी लेकिन सपनो की कोई कीमत नहीं होती।
सर्दियो की छुटियों में तरुण जी अपनी फ़ायरफ़ॉक्स की अमानत मुझे सौंप गए।
खूब चलायी खूब दौड़ाई 
इसी बीच सौरभ जी ने भी साइकिल ले ली थी , फिर कभी मैं सौरभ जी के कॉलेज तो सौरभ जी कभी मेरे कॉलज
कुछ दिन बाद जब कॉलेज खुलने वाले थे तो तरुण जी को भी सौरभ जी के साइकिल पर घर जाने का समाचार  मिला ।
तरुण भाई की मुलाकात सौरभ जी से मेरे द्वारा हुई थी और हम साथ ही चूड़धार गए थे ।

चूडधार का एक अदभुत नजारा 

तरुण भाई के घर से वापस आने से 2 दिन पहले मैं अपनी पहली स्कॉलरशिप से एक हरक्यूलिस की साइकिल ले आया और तैयार हो गया आस पास के क्षेत्रों की दूरिओ को कम करने के लिए और फिर सफरनामा कुछ इस बरकरार 
1. पहली साइकिल यात्रा - श्री आनंदपुर साहिब
2. मोरनी की अधूरी यात्रा
3. छप्पर चिड़ी - सिख साम्राज्य का अहम पृष्ठ
4. सिसवाँ  डैम और शीश महल गुरुद्वारा
5. फतेहगढ़ साहिब और ऊँचा पिंड संघोल
6. धर्मक्षेत्र - कुरुक्षेत्र की शतक  वाली यात्रा

जल्द ही सुनियेगा आनंदपुर साहिब की साइकिल यात्रा।।

तरुण जी